गोधना किला और मां चंडी मंदिर पर अतिक्रमण के आरोप, मंदिर में स्थित नीम का पेड़ काटने और पूजा स्थलों से छेड़छाड़ के आरोपों से फिर गरमाया मामला

बैतूल। ग्राम पंचायत गोधना स्थित लगभग 500 वर्ष पुराने गोंडवाना कालीन राजा ईल के ऐतिहासिक किले और मां चंडी देवी मंदिर से जुड़ा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। जिस ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर के संरक्षण के लिए केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके केंद्र और राज्य सरकार को पत्र लिखकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से सर्वे, शोध और संरक्षण की मांग कर चुके हैं, उसी परिसर में अब कथित अतिक्रमण, धार्मिक आस्था से जुड़े प्रतीकों को नुकसान पहुंचाने और मंदिर परिसर में छेड़छाड़ के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया तो क्षेत्र की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।

– मंत्री ने सरकार को भेजा था संरक्षण का प्रस्ताव

केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने 17 फरवरी को भारत सरकार के संस्कृति राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह तथा मध्य प्रदेश के संस्कृति, पर्यटन एवं धार्मिक न्यास मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी को पत्र भेजकर गोधना के खसरा क्रमांक 537 में स्थित लगभग 14.91 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले ऐतिहासिक किला परिसर का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं राज्य पुरातत्व विभाग से सर्वे, शोध और संरक्षण कराने का आग्रह किया था। पत्र की प्रतिलिपि पुरातत्व विभाग भोपाल की आयुक्त उर्मिला शुक्ला को भी भेजी गई थी। पत्र में इस पूरे परिसर को ऐतिहासिक महत्व का बताते हुए संरक्षित स्मारक घोषित करने की दिशा में कार्रवाई का अनुरोध किया गया था।

– धार्मिक स्थल की मूल संरचना से छेड़छाड़ के आरोप

ग्रामीणों का आरोप है कि संरक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले ही मंदिर परिसर की भूमि पर कथित अतिक्रमण के प्रयास शुरू हो गए हैं। उनका कहना है कि हरि यादव द्वारा मंदिर परिसर की भूमि पर हस्तक्षेप किया जा रहा है और प्रशासन की मौजूदगी में धार्मिक स्थल की मूल संरचना से छेड़छाड़ की गई है। ग्रामीणों का आरोप है कि मंदिर परिसर में वर्षों से श्रद्धा और आस्था का प्रतीक रहा प्राचीन नीम का वृक्ष भी काट दिया गया, जिससे पूरे क्षेत्र में नाराजगी व्याप्त है।

– नीम के पेड़ को मानते हैं मां चंडी का स्वरूप

स्थानीय लोगों का कहना है कि मां चंडी दरबार में स्थित नीम का पेड़ मां चंडी देवी की पूजा और धार्मिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा था। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं में नीम के वृक्ष को माता चंडी, दुर्गा, काली और शीतला माता का वास-स्थान माना जाता है। देश के अनेक शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में प्राचीन नीम का वृक्ष धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र होता है। श्रद्धालु इसकी पूजा करते हैं, जल अर्पित करते हैं और इसे देवी की कृपा का प्रतीक मानते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस वृक्ष को काटना उनकी धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाने वाला कदम है।

– पूजा स्थलों से छेड़छाड़ के भी आरोप

ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि मंदिर परिसर में स्थित अन्य पूजा स्थलों के साथ भी छेड़छाड़ की जा रही है। श्रद्धालुओ ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि मंदिर परिसर, ऐतिहासिक धरोहर या धार्मिक स्थलों के साथ किसी प्रकार की अवैध छेड़छाड़ अथवा अतिक्रमण हुआ है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा पूरे ऐतिहासिक परिसर का तत्काल सर्वे कर संरक्षण की प्रक्रिया शुरू की जाए, ताकि राजा ईल का ऐतिहासिक किला और मां चंडी देवी मंदिर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।

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