नशा अब गलियों तक नहीं, घरों के भीतर पहुंच चुका है; अब जागना समाज की मजबूरी है, विकल्प नहीं।
- श्रीमती हर्षा मनोज अग्रवाल, चिंतक, लेखिका एवं सामाजिक विचारक।

आज के दौर में नशे की परिभाषा बदल चुकी है और यह केवल मादक पदार्थों के सेवन तक सीमित नहीं रह गई है, अमानवीय वारदातों के रूप में हमारे सामने आ रही है। समाज और देश में नशा मुक्ति के लिए कभी कोई सशक्त और व्यापक आंदोलन खड़ा नहीं किया गया, जिसका परिणाम यह है कि नशा आज समाज के कण-कण में व्याप्त हो चुका है। मानवीय स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वह किसी न किसी लत का आदि हो जाता है और इसी कमजोरी के कारण आज समाज का हर तबका, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, नशे की गिरफ्त में है। विडंबना यह है कि लोग जीवन के क्षणभंगुर स्वरूप को समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे हैं। कोई जीवन जीने की तकनीक के नशे में चूर है, तो कोई अंधाधुंध पैसा कमाने की लत में डूबा हुआ है, और कुछ लोग तो इन दोनों के बीच की तरकीबों और सोच के नशे में ही उलझ कर रह गए हैं।
इस भागदौड़ और मानसिक अनभिज्ञता के कारण समाज में किसी के पास इतना समय या फुर्सत नहीं है कि वह निचले स्तर पर जाकर सुधार के विचारों को साझा कर सके। समाज के हर वर्ग, हर जाति और हर आयु समूह के लोग मादक पदार्थों की चपेट में आ रहे हैं, जिससे पूरा सामाजिक ढांचा धीरे-धीरे ढह रहा है। आज स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि शायद ही कोई ऐसा घर बचा हो जहां पिता, पुत्र या पुत्री में से कोई नशे का शिकार न हो। हमारे मोहल्ले और पड़ोस का लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में नशीले पदार्थों का सेवन कर रहा है, लेकिन समाज ने जैसे अपनी आंखें मूंद ली हैं।
भारतीय संविधान ने हर नागरिक को मौलिक अधिकार दिए हैं, जिसके तहत वह अपनी सुरक्षा और हक के लिए आवाज उठा सकता है, परंतु आम जनता इस शक्ति से पूरी तरह अनजान और अनभिज्ञ बनी हुई है। लोग यह समझने को तैयार नहीं हैं कि नशे की यह लत न केवल व्यक्ति को, बल्कि उसके पूरे परिवार और समाज को अपूरणीय क्षति पहुंचा रही है। नियमों के पालन की बात करें तो प्रशासन और समाज दोनों ही संवेदनहीन नजर आते हैं। कायदे के अनुसार गुटखा और सिगरेट की दुकानें स्कूल या पाठशाला से कम से कम 2 किलोमीटर दूर होनी चाहिए और शराब की दुकानें रिहायशी वार्डों से कम से कम 5 किलोमीटर की दूरी पर होनी चाहिए, लेकिन धरातल पर इन नियमों का कहीं कोई नामोनिशान नहीं मिलता। इन उल्लंघनों पर सवाल उठाने वाला कोई नहीं है क्योंकि समाज का हर व्यक्ति अपने निजी कार्यों, स्वार्थ और अहंकार के नशे में इस कदर व्यस्त है कि उसे अपने आसपास फैलते इस जहर की कोई परवाह नहीं है।




