12 शताब्दियों के बाद पूर्वजों की धरती पर पहुंचे राजा भोज के वंशज।
भोजशाला से गढ़ कालिका तक, धारा नगरी में फिर जीवंत हुआ परमार इतिहास।

बैतूल। इतिहास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, वह अवसर मिलते ही अपनी जड़ों की ओर लौटता है। मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक धारा नगरी में इन दिनों कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिल रहा है। लगभग 13वीं शताब्दी पूर्व परिस्थितियों के चलते अपनी राजधानी छोड़कर सतपुड़ा के अंचलों, विदर्भ और देश के विभिन्न हिस्सों में बसने वाले अग्रिवंशी पंवार समाज के लोग एक बार फिर अपने गौरवशाली अतीत की ओर लौट रहे हैं। इस लौटने की सबसे बड़ी वजह बना राजा भोज की भोजशाला को लेकर इंदौर उच्च न्यायालय का हालिया फैसला, जिसने धारा नगरी के साथ पंवार समाज के भावनात्मक और ऐतिहासिक रिश्ते को फिर जीवंत कर दिया है।
धारा नगरी, जिसे आज धार नगर के नाम से जाना जाता है, मध्यकालीन भारत के इतिहास, शिक्षा, साहित्य और संस्कृति का एक महान केंद्र रही है। नौवीं से चौदहवीं शताब्दी तक यह परमार अथवा पंवार वंश की राजधानी रही। इस नगरी का स्वर्णकाल महान सम्राट राजा भोज के शासनकाल में आया। लगभग 1010 ईस्वी से 1055 ईस्वी तक शासन करने वाले राजा भोज को भारतीय इतिहास के सबसे विद्वान और दूरदर्शी शासकों में गिना जाता है।

इतिहासकारों और समाजजनों के अनुसार परमार वंश की राजधानी रही धारा नगरी को छोड़ने के पीछे समय-समय पर हुए राजनीतिक बदलाव, विदेशी आक्रमण और सामाजिक परिस्थितियां प्रमुख कारण रहीं। इसके बाद पंवार समाज के लोग बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट, विदर्भ, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा सहित देश के अनेक हिस्सों में जाकर बस गए। सदियों बाद भोजशाला को लेकर आए न्यायिक निर्णय ने इन बिखरे हुए वंशजों को फिर अपनी जड़ों की ओर आकर्षित किया।
– ताप्ती जल से हुआ जलाभिषेक और शुद्धिकरण
बैतूल जिले से पवित्र सूर्यपुत्री मां ताप्ती का जल लेकर पहुंचे मां सूर्यपुत्री ताप्ती जागृति समिति मध्यप्रदेश के अध्यक्ष डॉ. रामकिशोर दयाराम पंवार रोंढ़ावाला ने भोजशाला परिसर में मां वाग्देवी के प्रतीक स्वरूप स्थापित प्रतिमा का वैदिक मंत्रोच्चार के साथ जलाभिषेक कराया। भोज उत्सव समिति एवं भोजशाला मुक्ति अभियान के प्रमुख सूत्रधार पंडित गोपाल शर्मा की उपस्थिति में मां वाग्देवी की आराधना के साथ भोजशाला परिसर का ताप्ती जल से शुद्धिकरण भी किया गया।
इस अवसर पर विदर्भ नागपुर महानगर क्षेत्र के विभिन्न पंवार समाज संगठनों के पदाधिकारी और समाजजन भी बड़ी संख्या में पहुंचे। दर्जनों वाहनों के काफिले के साथ धारा पहुंचे श्रद्धालुओं ने राजा भोज और मां वाग्देवी के जयघोषों से पूरे क्षेत्र को गुंजायमान कर दिया। समाज के लोगों ने भोजशाला सहित धारा के विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के दर्शन किए तथा अपनी कुलदेवी मां गढ़ कालिका के मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना भी की।
– ज्ञान, संस्कृति और साहित्य की राजधानी थी धारा
पंडित गोपाल शर्मा ने बताया कि धारा नगरी, जिसे वर्तमान में धार नगर के नाम से जाना जाता है, मध्यकालीन भारत की सबसे प्रतिष्ठित राजधानियों में गिनी जाती है। 9वीं से 14वीं शताब्दी तक यह परमार वंश की राजधानी रही। मालवा क्षेत्र में परमार शासकों ने अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद धारा को राजनीतिक केंद्र बनाया, इसे शिक्षा, साहित्य, दर्शन, संस्कृति और कला का भी प्रमुख केंद्र विकसित किया।
धारा नगरी का स्वर्णकाल परमार सम्राट राजा भोज के शासनकाल में माना जाता है। लगभग 1010 से 1055 ईस्वी तक शासन करने वाले राजा भोज भारतीय इतिहास के महानतम विद्वान राजाओं में शामिल हैं। उनके संरक्षण में साहित्य, वास्तुकला, चिकित्सा, ज्योतिष, व्याकरण और दर्शन जैसे अनेक विषयों का अभूतपूर्व विकास हुआ। राजा भोज के समय धारा नगरी की प्रतिष्ठा इतनी थी कि उस काल में एक प्रसिद्ध उक्ति प्रचलित थी- अद्य धारा सदाधारा, सदालम्बा सरस्वती। पण्डिता मण्डिताः सर्वे, भोजराजे भुवि स्थिते॥ अर्थात राजा भोज के शासनकाल में धारा ज्ञान की धारा से समृद्ध थी और विद्वानों का सम्मान सर्वोच्च था।
– भोजशाला बनी विद्या और सरस्वती उपासना का केंद्र
धार स्थित भोजशाला को परंपरागत रूप से राजा भोज द्वारा स्थापित विद्या एवं मां सरस्वती की उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसे कभी विद्या की काशी के रूप में भी प्रतिष्ठा प्राप्त थी। यहां संस्कृत, प्राकृत और नागरी लिपि के अनेक अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जो इसे मध्यकालीन भारत के महत्वपूर्ण शैक्षणिक केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। यहां विद्वानों की सभाएं आयोजित होती थीं और ज्ञान-विज्ञान की परंपरा निरंतर प्रवाहित रहती थी।
राजा भोज ने अपने शासनकाल में अनेक मंदिरों, सरोवरों और स्थापत्य कृतियों का निर्माण कराया। भोजपुर का विश्वप्रसिद्ध शिव मंदिर, भोपाल का विशाल भोजताल और वास्तुकला पर आधारित महत्वपूर्ण ग्रंथ समरांगण सूत्रधार आज भी उनके अद्वितीय योगदान के प्रमाण माने जाते हैं। धारा नगरी उनके काल में कला, साहित्य और स्थापत्य की ऐसी राजधानी बनी जिसकी ख्याति पूरे भारत में फैली।
– आज भी जीवित है राजा भोज की गौरवगाथा
राजा भोज की मृत्यु के बाद परमार साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर हुआ और बाद में विभिन्न मुस्लिम शासकों के आक्रमणों तथा राजनीतिक परिवर्तनों के कारण धारा का राजनीतिक महत्व कम होता गया। इसके बावजूद इसका ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व आज भी अक्षुण्ण बना हुआ है। धार का किला, भोजशाला, गढ़ कालिका मंदिर और अन्य प्राचीन स्मारक आज भी उस गौरवशाली युग की याद दिलाते हैं, जब धारा पूरे भारत में ज्ञान और संस्कृति की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित थी।
धारा नगरी में आयोजित यह आयोजन परमार-पंवार समाज की ऐतिहासिक स्मृतियों, सांस्कृतिक पहचान और पूर्वजों की विरासत से पुनः जुड़ने का भावनात्मक अवसर बन गया। सदियों बाद अपनी राजधानी में लौटे समाजजनों की उपस्थिति ने यह संदेश भी दिया कि इतिहास भले ही समय की धूल में दब जाए, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ाव कभी समाप्त नहीं होता। धारा नगरी में गूंजते जयघोषों के बीच एक बार फिर राजा भोज की गौरवगाथा जीवंत होती दिखाई दी।




