राष्ट्रपति के बैतूल आगमन पर आदिवासी अधिकारों का मुद्दा उठाएगा जयस।

76 वर्षों से लंबित आदिवासी अधिकारों को लेकर राष्ट्रपति से मिलने की तैयारी। भूमि अधिकार और पांचवीं अनुसूची पर राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने की मांग।

बैतूल। आगामी 18 जून को महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के बैतूल आगमन को लेकर आदिवासी समाज से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की तैयारी शुरू हो गई है। जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) ने ब्रह्मकुमारीज आश्रम द्वारा आयोजित समन्वय बैठक में राष्ट्रपति से भेंट कर ज्ञापन सौंपने के लिए समय उपलब्ध कराने की मांग रखी है। संगठन का कहना है कि आदिवासी समाज के भूमि अधिकार, पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों के क्रियान्वयन तथा ऐतिहासिक अन्याय से जुड़े विषयों को राष्ट्रपति के समक्ष रखा जाना आवश्यक है।

जयस के जिला संसक्षक इंजी. राजा धुर्वे ने बताया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 18 जून को बैतूल स्थित ब्रह्मकुमारीज आश्रम के कार्यक्रम में शामिल होने आ रही हैं। इसी अवसर पर आदिवासी समाज की ओर से ज्ञापन सौंपने और विभिन्न लंबित मुद्दों पर चर्चा करने का प्रयास किया जा रहा है।

जयस का कहना है कि भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची की धारा 5 के तहत आदिवासियों की भूमि की सुरक्षा तथा भूमि आवंटन संबंधी मामलों में राज्यपाल और राष्ट्रपति को विशेष जिम्मेदारी एवं अधिकार प्रदान किए गए हैं। संगठन के अनुसार स्वतंत्रता के बाद से अब तक इन संवैधानिक प्रावधानों का आदिवासी हित में प्रभावी उपयोग नहीं किया गया है। जयस ने यह भी उल्लेख किया कि अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 की प्रस्तावना में संसद ने स्वयं जनजातीय समाज पर हुए ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार किया है।

संगठन ने अपने पक्ष में ऐतिहासिक तथ्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1950 में भूमि सुधार की प्रक्रिया के दौरान अर्जित की गई जमीनों को वर्ष 1956 में राजस्व विभाग से वन विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया था। जयस के अनुसार बैतूल जिले के 683 राजस्व ग्रामों की लगभग 3 लाख 60 हजार 478 एकड़ भूमि, जो जंगल मद और गैर जंगल मद में सार्वजनिक एवं निस्तारी प्रयोजनों के लिए दर्ज थी, वन विभाग को सौंप दी गई। बाद में वन विभाग ने वर्ष 1958 में इन क्षेत्रों को संरक्षित वन घोषित किया तथा वर्ष 1975 तक भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 4 एवं धारा 34(अ) के तहत अधिसूचनाएं जारी की गईं।

जयस का दावा है कि इन मामलों में भारतीय वन अधिनियम की धारा 5 से 19 तक की आवश्यक जांच प्रक्रिया आज भी पूर्ण नहीं हुई है और इससे संबंधित प्रकरण वर्तमान में अनुविभागीय अधिकारी बैतूल, मुलताई एवं भैंसदेही के स्तर पर लंबित हैं। संगठन का कहना है कि इन विषयों पर राष्ट्रपति के समक्ष तथ्यात्मक जानकारी रखकर आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक पहल की मांग की जाएगी।

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