अब गांव की बारी…
अहा, ग्राम जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका मन चाहे, थोड़े में निर्वाह यहां है, ऐसी सुविधा और कहां है।

छोटे-से मिट्टी के घर है, लिपे-पुते हैं स्वच्छ सुघर हैं,
खपरैलों पर बेंले छाई, फली-फूली हरी मन भाई,
अतिथि कहीं जब आ जाता है, वह आतिथ्य यहां पाता है।
ठहराया जाता है ऐसे, कोई संबंधी हो जैसे…

राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की ग्राम्य जीवन के परिदृश्य का अपने सरल शब्दों से चित्रण करने वाली इस कालजयी रचना के अब साकार होने की आवश्कता आन पड़ी है। अमूमन भारत के प्रत्येक गांव कविवर की इस रचना के ईद-गिर्द ही परिक्रमा करते नजर भी आते है। ग्राम्य जीवन की सुखद अनुभूति कराने वाली इस रचना में ग्रामों में अतिथि को भी पूरे आदर और सत्कार से अपनाने का आत्मीय अनुक्रम है। ऐसे में हमारे बैतूल जिले में आगजनी का शिकार गांव बर्राढाना आंखों से ओझल ही नहीं हो पा रहा है। एक चिंगारी यहा तबाही का कारण बन गई। 18 घर धूं-धूं कर जल उठे, 6 घरों को भी आंशिक नुकसान का दंश झेलना पड़ा, 50 से ज्यादा मवेशियों के लिए आंधी के साथ उठी चिंगारी से मची तबाही काल बन गई। हर तरफ चीख-पुकार थी, लेकिन इस तबाही के बीच भी एक बड़ी राहत यह थी कि जन-जीवन सुरक्षित था। मां की उंगली थामें बच्चे और गोद में बच्चों को लेकर आग की लपटों से मांओं ने परिवार बचा लिए, बस घर नहीं बचा पाई, सब राख हो गया…शीर्ष से लेकर मैदानी अमला गांव में पहुंचा, तुरंत राहत के प्रयास किए, स्कूल के मैदान में पंडाल लगाकर आगजनी पीडि़तों के परिवारों को ठहराया। स्कूल के परिसर में स्व सहायता समूह के माध्यम से एक सैकड़ा से अधिक पीडि़तों के लिए भोजन का इंतजाम किया। सहृदय बैतूलवासियों ने दिल खोलकर मदद के लिए हाथ बढ़ाए। प्रशासन, जनप्रतिनिधि और हर व्यक्ति यही चाहता है कि, जल्दी से जल्दी फिर से बेघर हुए लोगों को सुरक्षित आशियाना मिल जाए। जले हुए घरों को जेसीबी एवं अन्य मशीनरी का उपयोग कर अब सपाट कर दिया है। घर बनाने के लिए सरकार और प्रशासन हर संभव मदद के लिए तैयार है, लेकिन बार-बार करवट लेता मौसम चिंतित भी कर रहा है कि यदि अचानक तेज बारिश हुई तो जिस बर्राढाना में आग ने तबाही मचाई थी, वहां बरसात कहर ढा देगी। सब तो साथ है, सब मदद करना भी चाहते है लेकिन जब तक सुरक्षित छत का निर्माण नहीं हो जाता जरुरत है, अब गांव को आगे आने की। पीडि़त परिवार को जल्द से जल्द उनका आशियाना मिल जाए इसलिए उन्हें लगभग 4 लाख रुपए की मदद की जा रही है। यदि घरों के निर्माण के लिए प्रशासन मध्यस्थता कर ही रहा है तो प्रशासन को ही इन पीडि़तों के आशियाने बनाने की पहल करनी चाहिए। राहत राशि से घरों का निर्माण करने का ठेका किसी कम्पनी को देकर बर्राढाना के लिए राहत की मिसाल पेश की जा सकती है। जब बैतूल में 18 दिनों में रेलवे ब्रिज का निर्माण किया जा सकता है तो 8 दिनों में घरों का निर्माण क्यों संभव नहीं है। अभी खेत खाली है, इन कृषि आश्रित परिवारों के पास भी काम नहीं है, ऐसे में अपने आशियाने का निर्माण करने में सभी एकजुटता दिखा सकते है। एक से घरों को एक समय सीमा निर्धारित कर तैयार कर, एक साथ परिवारों का गृह प्रवेश कराया जा सकता है। ऐसे सुखद पल के साक्षी चाहे तो प्रदेश के मुखिया डॉ मोहन यादव भी बन सकते है। इस समय जब हर परिवार को घुमड़ते बादलों को देख अपने बच्चों एवं राहत के रुप में मिले सामान को सुरक्षित रखने की चिंता सता रही है, ऐसे में गांव को दो कदम आगे बढक़र इन परिवारों को आश्रय देने की भी जरुरत है। कलेक्टर डॉ सौरभ संजय सोनवणे ने गांव में पहुंचकर पीडि़तों के बीच दो बार चौपाल लगाई पर अब एक चौपाल में पीडि़तों के साथ-साथ बर्राढाना के प्रत्येक ग्रामवासी की मौजूदगी की जरुरत है। हम मैथलीशरण जी के उन गांवों की परिकल्पना को जीवंत क्यों नहीं कर सकते जिनमें अतिथियों को भी गांव में सगे संबंधियों के जैसे ठहराने का भाव है। जिनके सर पर आज छत नहीं है वह पड़ोसी है, अपने है, सगे भी है और संबंधी-कुटुम्बी भी। क्यों न गांव का हर घर जो आंधी से बच गया, जिस पर आग का कहर नहीं बरपा वह तब तक अपने बेघर हुए ग्राम-परिवारों को अपने घर का एक कक्ष चाहे तो किराए पर दे दे या एक परिवार को अपना अतिथि बना ले जब तक उनका आशियाना नहीं बन जाता। बस घर का एक कमरा जिसमें वह राहत में मिला सामान सुरक्षित रख सके और बेफिक्री से अपने घर को बनाने में जुट जाए। सबने अपना फर्ज निभाया है अब गांव की बारी है…।
गौरी बालापुरे पदम





