बैतूल में राजस्व जमीन को आरक्षित वन बनाने पर जयस का बड़ा आरोप, 456 वनखण्डों पर वैधानिक आपत्ति।

बैतूल। जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) ने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) बैतूल, मुलताई और भैंसदेही पर संविधान, कानून और न्यायालयीन आदेशों की अवमानना करते हुए राजस्व अभिलेखों में दर्ज सार्वजनिक जमीनों को वन विभाग के साथ मिलकर आरक्षित वन घोषित करने की कार्यवाही करने का गंभीर आरोप लगाया है। संगठन ने महामहिम राज्यपाल के नाम कलेक्टर बैतूल को ज्ञापन सौंपकर कुल 456 वनखण्डों पर वैधानिक आपत्ति दर्ज कराई है।
जयस के अनुसार अनुविभागीय अधिकारी बैतूल के समक्ष 181, भैंसदेही में 217 और मुलताई में 58 वनखण्ड लंबित हैं, जिनमें राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज जमीनों को वन भूमि में शामिल करने की प्रक्रिया चल रही है।
संगठन का कहना है कि भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 29, 20 और 4 से 19 तक निर्धारित प्रक्रिया के बिना ही इन जमीनों को वर्किंग प्लान में शामिल कर कब्जा किया जा रहा है, जबकि ऐसा करने का अधिकार वन विभाग को नहीं है।
– पेसा और वन अधिकार कानून की अनदेखी का आरोप
जयस ने कहा कि संविधान की 11वीं अनुसूची, पेसा कानून 1996 और वन अधिकार कानून 2006 के तहत निस्तारी और सार्वजनिक जमीनों पर ग्रामसभा और ग्राम पंचायत का नियंत्रण मान्य है, लेकिन वन विभाग और राजस्व अधिकारी इन प्रावधानों को नजरअंदाज कर रहे हैं।
संगठन ने कहा कि संविधान की 5वीं अनुसूची के तहत आदिवासी हितों की रक्षा के लिए पहली बार आदिवासी समाज स्वयं राष्ट्रपति और राज्यपाल से कार्रवाई का अनुरोध कर रहा है, जबकि दोनों ही पदों पर आदिवासी प्रतिनिधित्व है।
जयस ने राजस्व और वन विभाग के अधिकारियों को चेतावनी दी है कि अवैधानिक कार्यवाही तुरंत बंद की जाए, अन्यथा आदिवासी समाज आंदोलन तेज करेगा और जरूरत पड़ने पर राजभवन व राष्ट्रपति भवन के घेराव की योजना भी बनाई जाएगी। इस संबंध में संदीप धुर्वे, राजा धुर्वे और महेश उइके ने संयुक्त रूप से बयान जारी किया है।




