आखिर वीरांगना झांसी की लक्ष्मीबाई के हिस्से सम्मान में इस देश में क्या आया?  

रेलवे स्टेशन,उद्यान, स्कूल का नाम, स्कूल के पाठ्यक्रम में अध्याय? भाग _10

त्वरित टिप्पणी – हेमंत चंद्र दुबे बबलू बैतूल

1857 की क्रांति देश की आजादी की लौ अपने प्राणों की आहुति देकर प्रज्वलित करने वाली अदम्य साहस , साक्षात् देवी स्वरूपा वीरांगना लक्ष्मीबाई। क्या हमारी आजाद भारत की सरकारों का नजरिया वही है जो अंग्रेजो का था कि क्रांति की अलख जगाने वाले, देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले, भारत मां को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने वाले अंग्रेजों के कनून में देशद्रोह के अपराधी माने जाते थे ,तो क्या सम्मानों के देने में आजाद भारत की सरकारों के नजर में ये क्रांतिकारी देश द्रोही और अपराधी है सरकार को राजनेताओं को स्पष्टीकरण देना चाहिए क्योंकि क्रांतिकारियों के नाम सम्मानों की सूची में शामिल नहीं किये जाते है? और अगर ऐसा है तो हमें यह मानना चाहिए कि देश आज भी गुलाम है। देश की जनता पर लानत है जो आज तक मेरे देश की सरकारों राजनेताओं से यह पूछ न सकी कि आजादी की देवी वीरांगना लक्ष्मीबाई इस देश में भारत रत्न की हकदार क्यों नहीं है? यदि वे भारत रत्न से ऊपर है ,जो वे है तो फिर सरकार ने क्यों आज तक संसद में एक पंक्ति का प्रस्ताव पारित करा की वीरांगना लक्ष्मीबाई भारत में दिए जाने वाले सब सम्मानों से ऊपर है, लेकिन आज तक देश की सरकारों ने ऐसा प्रस्ताव पारित नहीं किया और न ही वीरांगना लक्ष्मीबाई को सम्मान दिया। ये चतुर नेता एक पंक्ति में कहते सुने जा सकते है वीरांगना लक्ष्मीबाई सम्मानों से ऊपर है, आपके कहने से इस पर संवैधानिक व्यवस्था दी जानी चाहिए थी । आजाद भारत की सरकारों ने सम्मानों की दी जाने श्रेणी में क्रांतिकारियों के लिए कोई श्रेणी ही नहीं बनाई है और इसलिए जब श्रेणी ही बनाई गई तो सम्मान कैसे मिलेगा? और यह उचित भी है लेकिन क्या सरकारों को क्रांतिकारियों के नाम से संसद में प्रस्ताव नहीं पारित करना चाहिए था, क्या क्रांतिकारियों के तेल चित्र संसद भवन में नहीं लगवाना चाहिए ?देश के प्रधानमंत्री को 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को क्यों संबोधन देना चाहिए , क्यों नहीं वीरांगना लक्ष्मीबाई के किले की प्राचीर से देश को संबोधित करना चाहिए जहां से वीरांगना लक्ष्मीबाई ने अपने बेटे दामोदरदास को पीठ पर बांधकर घोड़े से नीचे खाई में अपने प्राणों की परवाह किये बिना छलांग लगा दी, और हवा में तलवार लहराते हुए की मै अपनी झांसी नहीं दूंगी के जयघोष से संसार की समस्त दिशाओं को हिला कर रख दिया था, किले उस प्राचीर से प्रधानमंत्री जी को देश को संबोधित करना चाहिए, क्यों शाहजहाँ के बनाए किले से देश को संबोधित करना चाहिए ? संबोधन नहीं करते प्रतिवर्ष, जिस वर्ष क्रांति के 100 वर्ष पूरे हुए थे तब वीरांगना लक्ष्मीबाई के किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री संबोधन कर देते चलिए 1957 में तो नेहरू थे गलती करना और मुग़लई इमारतों से उनका अद्भुत प्रेम था, तो देश की आजादी की 75 वीं वर्षगांठ पर वर्तमान प्रधानमंत्री जी आप वीरांगना लक्ष्मीबाई के किले की प्राचीर से देश को संबोधित कर लेते आप तो नाम बदलने और नवाचार करने के मास्टर पिस है, आप भी नेहरू जी वाले लाल किले पर चढ़ना नहीं भूलते! आप भी वीरांगना लक्ष्मीबाई के किले पर से देश को संबोधित करना भूलते हो?

चतुर नेताओं ने आजादी की देवी वीरांगना लक्ष्मीबाई का पाठ , सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी है स्कूलों में पढ़वाना तो प्रारंभ करवा दिया, रेलवे स्टेशन, उद्यान, स्कूलों के नाम तो रखवा दिए लेकिन वीरांगना को आज तक भारत रत्न नहीं कहते और बोलते, आखिर स्वयं भारत रत्न हो गए लेकिन वीरांगना को आज तक भारत रत्न वीरांगना लक्ष्मीबाई नहीं कह सके, जिसने युद्ध लड़वाया वह देश में दुर्गा कहलाकर भारत रत्न हो गई और जिस साक्षात दुर्गा वीरांगना लक्ष्मीबाई ने युद्ध लड़ते हुए प्राणों की आहुति दे दी ,वह केवल रेलवे स्टेशन , उद्यानों में नाम पाकर सिमटकर रह गई, यह कौन सा न्याय है? स्टेशन तो गंदे हो जाते है, उद्यान तो उजड़ जाते है, पाठ्यक्रम तो सरकारी नीतियों से बदल दिये जाते है, मूर्तियों पर तो धूल जम जाती हैं लेकिन भारत रत्न, भारत रत्न होता हैं जिसकी चमक और सम्मान को आप चतुर नेताओं की राजनीति ने समाप्त कर दिया है। देश के चतुर नेताओं ने उनके वास्तविक हकदारों को उससे वंचित किया है, और इसलिए उस सम्मान की चमक धूमिल मिट्टी में मिल चुकी हैं! देश की जनता को जागना होगा और पूछना होगा कि वीरांगना लक्ष्मीबाई भारत रत्न क्यों नहीं है? आजादी के पूर्व के बलिदानी , इस देश भारत रत्न नहीं कहला पाएं?

सम्मान लेने वालों ने आज तक सम्मान देने वालों , बांटने वालों से यह नहीं पूछा कि इस देश में वीरांगना लक्ष्मीबाई के नाम के आगे भारत रत्न वीरांगना लक्ष्मीबाई क्यों नहीं लग सका? और हम क्यों भारत रत्न पद्म सम्मान से सम्मानित हो गए? इस देश की सिर्फ वोट डालने वाली जनता ने चतुर नेताओं से आज तक नहीं पूछा कि वीरांगना लक्ष्मीबाई भारत के सब सम्मानों से ऊपर है तो इस पर! संवैधानिक व्यवस्था क्यों नहीं दी गई?

इस देश में जिन्होंने देश के लिए प्राण न्योछावर कर दिये वे सम्मानों से कोसों दूर है ?

वीरांगना लक्ष्मीबाई को जब उनके हिस्से का सम्मान नहीं मिलता है तो मजबूरी में कहना पड़ता है कि देश में सम्मान दिए नहीं बांटे और लिए जाते हैं ______________

नोट _जिनको सम्मानित किया उनके प्रति हमारा पूरा सम्मान है लेकिन प्रश्न है कि वीरांगना लक्ष्मीबाई सम्मानों से क्यों वंचित है?

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