संतों की सिद्ध भूमि निमनवाड़ा में गुरुमाता देवी ज्ञानेश्वरी ने दिया दिव्य मार्गदर्शन

गोरखनाथ परंपरा की भूमि में आध्यात्मिक चेतना का हुआ नवसंचार

बैतूल। संतों की सिद्ध भूमि खेड़ीकोर्ट–निमनवाड़ा में आयोजित मां बगलामुखी देवी का त्रिकालदर्शी दिव्य दरबार अपने चतुर्थ दिवस में भक्ति, श्रद्धा और दिव्यता के वातावरण के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर आठनेर, बैतूल, मुलताई सहित आसपास के क्षेत्रों से सैकड़ों श्रद्धालु मां बगलामुखी माता की दिव्य कृपा और मार्गदर्शन प्राप्त करने दरबार में पहुंचे।

दरबार में मां बगलामुखी देवी की सिद्ध संत परमपूज्य गुरुमाता देवी ज्ञानेश्वरी गोस्वामी जी ने बिना पूछे और बिना जन्म-दिनांक के भक्तों के जीवन में चल रही समस्याओं का सटीक वर्णन किया। साथ ही उनके निवारण के लिए रत्न चिकित्सा, मंत्र चिकित्सा तथा मां बगलामुखी दीक्षा लेकर कुलदेवी मां पितांबरा की साधना का विधिवत विधान बताया। गुरुमाता जी की अमृतवाणी और दिव्य ज्ञान से प्रभावित होकर अनेक श्रद्धालु उनके उपदेशों को जीवन में आत्मसात कर आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं।

– गोरखनाथ मठ पूरे जिले में विख्यात

मां बगलामुखी त्रिकालदर्शी दिव्य दरबार आयोजन समिति के देवशंकर धोटे ने बताया कि निमनवाड़ा–खेड़ीकोर्ट क्षेत्र सिद्ध और दिव्य संत भूमि है, जहां बाबा गोरखनाथ की कई पीढ़ियों से उपासना होती चली आ रही है। यहां स्थित गोरखनाथ मठ पूरे जिले में विख्यात है। उन्होंने कहा कि समय के साथ संतों का आगमन कम होने से लोग कुलदेवी-देवताओं की उपासना पद्धतियों से दूर हो गए थे, जिससे पारिवारिक, वास्तु और ग्रहदोष से जुड़ी समस्याएं बढ़ीं, लेकिन गुरुमाता देवी ज्ञानेश्वरी गोस्वामी जी के सान्निध्य में पुनः माँ बगलामुखी की दीक्षा, वास्तु ज्ञान, ज्योतिष ज्ञान और दिव्य चिकित्सा का मार्ग प्रशस्त हुआ है, जिससे क्षेत्र में आध्यात्मिक चेतना का नवसंचार हो रहा है।

– मां बगलामुखी देवी दस महाविद्याओं में अष्टम महाविद्या

आयोजन समिति के सदस्य वासुदेव ताड़गे ने बताया कि मां बगलामुखी देवी दस महाविद्याओं में अष्टम महाविद्या हैं, जिनकी विधिवत उपासना से प्रारब्ध दोष, भाग्य दोष, कर्म दोष और संस्कार दोष से मुक्ति मिलती है। उन्होंने कहा कि इन दोषों की पूर्ण शांति सिद्ध और दिव्य गुरु के सान्निध्य में भक्ति से ही संभव है। ताप्ती अंचल के लिए यह सौभाग्य का विषय है कि माँ बगलामुखी की सिद्ध साधिका, परम तपस्विनी और परम योगिनी गुरुमाता देवी ज्ञानेश्वरी गोस्वामी जी का आगमन इस क्षेत्र में हुआ है, जिनके माध्यम से धर्म की पुनर्स्थापना, आत्मनिर्भरता की प्रेरणा और गुरुकुल परंपरा का पुनर्जागरण हो रहा है।

– बचपन से की मां भगवती की उपासना

इस अवसर पर गुरुमाता देवी ज्ञानेश्वरी गोस्वामी जी ने अपनी साधना यात्रा का वर्णन करते हुए बताया कि वे बचपन से मां भगवती की उपासना करती आ रही हैं। उनके पिताश्री सत्यनारायण गिरी गोस्वामी महाराज परम तपस्वी संत हैं, जिन्होंने कुंडलिनी योग के माध्यम से तीन दिन से लेकर तीन माह ग्यारह दिनों तक की अखंड भूमिगत समाधि साधना की है। उन्हीं के सान्निध्य और उपदेश से उन्हें कुंडलिनी योग का दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ, जिससे उनके सातों चक्र जाग्रत हुए। गुरुमाता जी ने बताया कि छठा चक्र आज्ञा चक्र गुरु का स्थान होता है, जिसके जाग्रत होने से भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान प्राप्त होता है, और यह सम्पूर्ण दिव्य अनुभूति उनके इष्ट देवी मां बगलामुखी की कृपा से संभव हुई है।

कार्यक्रम के अंत में गुरुमाता देवी ज्ञानेश्वरी गोस्वामी जी ने समस्त भक्त-श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान करते हुए उनके जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति की कामना की।

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