The elderly person got support: बुजुर्ग पिता को घर से निकाला, अब न्यायालय ने सुनाया बेटों को 5 हजार रुपए प्रतिमाह देने का फैसला

बैतूल। आमला न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए बुजुर्ग पिता को भरण पोषण का अधिकार दिलाया है। बेटों द्वारा घर और जमीन से बेदखल किए जाने के बाद बुजुर्ग ने न्यायालय में गुहार लगाई थी। अब कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी बेटे मिलकर उन्हें हर माह 5 हजार रुपए भरण पोषण राशि देंगे। इस फैसले से भविष्य में कोई भी बुजुर्गों को बेसहारा छोड़ने से पहले सोचने को मजबूर होगा।

बैतूल जिले की आमला तहसील के ग्राम ससुन्द्रा निवासी भद्दू पिता इंदल ने अपने बेटों के खिलाफ न्यायालय में भरण पोषण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। भद्दू ने बताया कि उनके बेटों रमेश, सुभाष, कपूरचन्द, अमरचन्द्र और करमचन्द ने उन्हें घर से निकाल दिया और उनकी 30 एकड़ कृषि भूमि पर भी कब्जा कर लिया। वृद्धावस्था के कारण भद्दू मजदूरी करने में असमर्थ हैं और उनके पास जीवनयापन के लिए कोई साधन नहीं है।
भद्दू ने बताया कि बेटे उन्हें घर से बेदखल कर चुके हैं, उनकी जमीन भी हड़प ली है। इस स्थिति में उन्होंने न्यायालय से भरण पोषण के लिए सहायता मांगी। मामले की सुनवाई के दौरान बेटों को नोटिस दिया गया, लेकिन कुछ ने सूचना पत्र लेने से इंकार कर दिया। ऐसे में न्यायालय ने एकपक्षीय सुनवाई करते हुए बुजुर्ग पिता की व्यथा सुनी।
अनावेदक पक्ष के कुछ पुत्रों ने अदालत में यह कहते हुए जवाब प्रस्तुत किया कि उन्हें पिता द्वारा कोई कृषि भूमि नहीं दी गई है और लगाए गए आरोप झूठे हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि न्यायालय कोई भरण पोषण राशि निर्धारित करता है तो वे उसका पालन करेंगे।
सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आमला न्यायालय के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) ने भद्दू के पक्ष में फैसला सुनाया। न्यायालय ने आदेश दिया कि रमेश पिता भद्दू, सुभाष पिता भद्दू, कपूरचन्द पिता भद्दू, अमरचन्द्र पिता भद्दू और करमचन्द पिता भद्दू सभी को अपने पिता भद्दू को हर माह एक-एक हजार रुपए भरण पोषण राशि देनी होगी। इस प्रकार कुल 5 हजार रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इस आदेश का पालन नहीं किया गया तो माता-पिता भरण पोषण अधिनियम 2007 और 2009 के तहत संबंधित बेटों के खिलाफ कारावास की कार्रवाई भी की जा सकती है। थाना प्रभारी आमला को आदेश का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। न्यायालय के इस निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि बुजुर्गों को उनके अधिकार दिलाने के लिए न्याय हमेशा खड़ा है।




