1934 में शुरू हुई थी आल्हा पढ़ने की परंपरा, तीन पीढ़ियों से निभा रहा धनोरा गांव

बैतूल। त्योहार की परंपराएं समय के साथ बदलती जरूर हैं, लेकिन कुछ परंपराएं ऐसी होती हैं जो पीढ़ियों को जोड़ने के साथ सामाजिक एकता की मिसाल भी बन जाती हैं। तहसील भीमपुर के ग्राम आदर्श धनोरा में भुजरिया के दिन पिछले 92 वर्षों से चली आ रही आल्हा पढ़ने की परंपरा ऐसी ही अनूठी विरासत है। यहां भुजरिया के अवसर पर गांव के सभी समाज के लोग एक साथ गांव पटेल के घर पहुंचते हैं और वीर रस से भरपूर आल्हा का सामूहिक गायन करते हैं। इसके बाद महिलाएं भुजरिया विसर्जन के लिए निकलती हैं और गांव के सभी घरों की भुजरिया भी इसी सामूहिक जुलूस के साथ नदी तक ले जाई जाती हैं।
गांव पटेल गणेशसिंह गौतम ने बताया कि उनके दादा गंगूसिंह (लंगड़ा) पटेल वर्ष 1934 में पहली बार आल्हा की किताब गांव में लेकर आए थे। तभी से भुजरिया के दिन आल्हा पढ़ने की परंपरा शुरू हुई, जो आज तक लगातार जारी है। करीब 92 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा तीन पीढ़ियों से निभाई जा रही है और पीढ़ी दर पीढ़ी इसका अनुसरण किया जा रहा है। भुजरिया के दिन गांव के लोग एक साथ बैठकर पूरे जोश और उत्साह के साथ आल्हा पढ़ते हैं।
– दशकों पुरानी है परंपरा
बुंदेलखंड और उत्तर भारत के कई हिस्सों में भुजरिया के त्योहार पर आल्हा गाने और सुनने की परंपरा दशकों पुरानी है। लोक कथाओं और महाकवि जगनिक द्वारा रचित आल्हा खंड के अनुसार महोबा के वीर योद्धा आल्हा और ऊदल ने राजा परमाल की बेटी चंद्रावलि को धर्म-बहन बनाया था। सावन में चंद्रावलि अपनी सखियों के साथ कीरत सागर तालाब पर भुजरिया विसर्जन और झूला झूलने गई थीं। इसी दौरान दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान की सेना ने महोबा पर हमला कर चंद्रावलि के डोले को घेर लिया। धर्म-बहन की रक्षा और सम्मान के लिए आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज की सेना से भीषण युद्ध किया, जिसे लोक परंपरा में भुजरियों की लड़ाई के नाम से जाना जाता है।
– मुस्लिम योद्धाओं के बलिदान का भी उल्लेख
इस वीरगाथा में आल्हा-ऊदल के परम मित्र सैयद यानी ताला सैयद और मुस्लिम योद्धाओं के भी युद्ध में शामिल होकर बलिदान देने का उल्लेख मिलता है। इसी वजह से भुजरिया पर आल्हा गायन को केवल वीरता की परंपरा नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और सामाजिक-सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी माना जाता है। आदर्श धनोरा में सभी समाज के लोगों का एक साथ बैठकर आल्हा पढ़ना इसी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाता है।
– जोश और उत्साह भरती हैं वीर रस की पंक्तियां
आल्हा गायन के दौरान वीर रस की पंक्तियां लोगों में जोश और उत्साह भरती हैं। परंपरा के अनुसार आल्हा के बाद लोग एक-दूसरे को भुजरिया भेंट करते हैं, पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और गले मिलकर पुरानी कड़वाहट भुलाते हुए भाईचारे का संदेश देते हैं। आदर्श धनोरा में 1934 से चली आ रही यह परंपरा आज भी गांव की सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों के बीच जुड़ाव की पहचान बनी हुई है।




