क्रांतिकारी बिरसा मुंडा जी जननायक, धरती आबा, भगवान सब कहे गये तो फिर भारत रत्न क्यों नहीं कहला पाएं?

*क्रांतिकारी बिरसा मुंडा जी जननायक, धरती आबा, भगवान सब कहे गये तो फिर भारत रत्न क्यों नहीं कहला पाएं? क्या वे देश के जल जंगल जमीन के लिए बलिदानी नहीं हुए? भाग 16*
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देश समाज की महान विभूतियों जिन्होंने अपना जीवन देश की मातृ भूमि, जल जंगल जमीन के लिए संघर्ष करते हुए बलिदान कर दिया। जल जंगल जमीन की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान कर बलिदानी हो गये, भगवान कहलाए , शहीद हो गये , उनके हिस्से के सम्मान में केवल मूर्तियां , सड़क, अस्पताल, बस स्टैंड रेलवे स्टेशन उद्यान के नाम रखे जाने लगे, गौरव दिवस मनाया जाने लगा लेकिन जो सत्ता में रहे, सियासत का हिस्से बने वे पद्म सम्मानों के हकदार हो गये।
जब क्रांतिकारी धरती आबा बिरसा मुंडा को भगवान कहा जाता हैं तो सरकार क्यों नहीं उनके मंदिर बनाने की पहल और निर्माण करती है? क्यों नहीं धरती आबा बिरसा मुंडा का चित्र लोकतंत्र के मंदिर संसद में लगाया जाता हैं ? जिन्होंने ने भारत मां को आजाद करने के लिए जीवन की सांसे समर्पित कर दी वे भारत रत्न पद्म सम्मान के हकदार नहीं हो सके अर्थात जो सत्ता में आए जिनसे सत्ता प्राप्ति के लिए स्वार्थ सिद्धि की जा सकती थी, वे भारत रत्न पद्म सम्मान के हकदार हो जाते है ,लेकिन जो क्रांति के नायक , जल जंगल जमीन को बचाने के अग्रदूत होते है, क्रांतिकारी बिरसा मुंडा भगवान तो कहलाये किन्तु भारत रत्न नहीं कहला सके? आखिर क्यों? सरकार को क्रांतिकारी बिरसा मुंडा जी को भारत रत्न कहने में क्या समस्या है? अब कहा जाएगा कि उनका स्थान सब सम्मानों से ऊपर भगवान का है तो फिर इस आशय का प्रस्ताव संसद में क्यों नहीं पारित किया जाता, जब राम मंदिर के निर्माण पर संसद में प्रस्ताव पारित किया जा सकता है तो फिर क्रांतिकारी भगवान बिरसा मुंडा जी हर सम्मान से ऊपर हमारे भगवान है पारित क्यों नहीं किया जा सकता, इसमें क्या समस्या हो सकती हैं? लेकिन ऐसा इसलिए नहीं होगा क्योंकि भगवान बिरसा मुंडा जी ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजाया था,वे अंग्रेजों के साथ वार्ता का हिस्सा नहीं थे, वे अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति के नायक थे, जो देश की आजादी में क्रांति के नायक थे वे इस देश में सब बड़ी बड़ी उपमाओं, शब्दों की जादूगरी से सब कहे गये संबोधित किये गए, सिर्फ वे भारत रत्न पद्म सम्मान नहीं कहलाएं ? इस देश में जिन्होंने भारत मां को आजाद कराने में सर्वोच्च बलिदान दिया वे भारत रत्न पद्म सम्मान नहीं है, उन्हें बड़ी चतुराई से शब्दों की जादूगरी का हिस्सा बनवा दिया , जो बोलना बोलिये सरकार को क्या आपत्ति हो सकती है, ताकि सरकारों की अंग्रेजों के समक्ष असहज स्थित निर्मित न होने पाये, क्योंकि अंग्रेज उन्हें अपराधी , राष्ट्र द्रोही मानते थे और मानते हैं, और हमारी आजाद भारत की सरकारें भी उन्हें यही समझती हैं और इसलिए आज तक क्रांतिकारी भगवान बिरसा मुंडा जी के कार्यों को संसद में याद नहीं किया जाता, न उन्हें सम्मानित किया जाता हैं, जो कुछ कहना है वह सड़कों पर कहिये , कोई भी उपमा या अलंकरण सरकारी दस्तावेज , संसदीय कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनने दिया गया, क्योंकि हम आजाद जरूर हो गए लेकिन विचारों, व्यापार की गुलामी हम आज भी अपने सिर पर ओढ़े हुए है और इसलिए भगवान बिरसा मुंडा जी को आप भगवान मानते कहते रहिये सरकार उन्हें न भगवान मानती है और न उन्हें भारत रत्न ।अगर ऐसा होता तो आज तक देश की आजादी के वर्षों बीत जाने के बाद भगवान बिरसा मुंडा जी के लिए दो पंक्ति का संसद में प्रस्ताव पारित किया जा सकता था कि भगवान बिरसा मुंडा जी हम सभी देशवासियों के भगवान और सभी सम्मानों से ऊपर है।
जब इस देश में ऐसा नहीं होता हैं तब कहना पड़ता है कि कि सम्मान दिए नहीं जाते है, बांटे लिये और वितरित किए जाते है।

हेमंत चंद्र दुबे बबलू बैतूल




