Election Result : चौक –चौराहों और ठियों पर एक ही चर्चा…किस करवट बैठेगा ऊंट !

Election Result: बैतूल। विधानसभा चुनाव के लिए बैतूल जिले की पांच विधानसभा सीटों पर भी वोटिंग हो गई। उम्मीदवार अपने समर्थकों के साथ जीत के गणित पर बात कर रहे हैं तो बैतूल ही नही जिले के सभी शहर और गांवों के राजनीतिक ठियों पर एक ही चर्चा है कि ऊंट आखिर किस करवट बैठेगा ?

पहले दमदारी से चुनाव लड़ने की बात हो रही थी, लेकिन अब अंतिम दिनों में अपनाए हथकंडे चर्चा में हैं। वोट प्रतिशत बढ़ने, महिलाओं की वोटिंग में ज्यादा हिस्सेदारी निभाने के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं।

चुनाव प्रचार के दौरान जहां उम्मीदवारों और उनके चुनाव प्रचार, रात में किए जाने वाले मैनेजमेंट को लेकर बात होती थी, वहीं अब लोग परिणामों को लेकर अटकलें लगा रहे हैं। बैतूल का गांधी चौक हो या लल्ली चौक चाहे गंज के सबसे पुराने ठिए पर भी चाय की चुस्कियों के बीच एक ही सवाल उठता है कि जीत कौन रहा ?

इसके जवाब मेें सभी के अलग-अलग तर्क हैं।  ठिए पर एक का कहना था कि ज्यादा वोटिंग यानी लोग परिवर्तन चाहते हैं। दूसरे ने तपाक से बात काटते हुए कहा कि ज्यादा वोटिंग यानी सरकार को समर्थन भी है। महिलाओं की ज्यादा वोटिंग पर एक ने कहा कि यह लाड़ली बहना का असर है तो दूसरे का तर्क था कि महंगाई ने त्रस्त कर दिया है, इसलिए ज्यादा महिलाएं वोट देने आईं। एक तर्क यह भी है कि ओपीएस को भूल ना जाना। यह सत्ता के खिलाफ सबसे बड़ा मतदान कराने का कारण भी हो सकता है।

जिले में सबसे ज्यादा चर्चा बैतूल, मुलताई और आमला सीट को लेकर हो रही है। इन सीटों पर मतदान के बाद से हर दिन गुणा भाग का परिणाम बदल जाता है। दिग्गजों की प्रतिष्ठा और राजनीतिक भविष्य दांव पर होने के कारण हार और जीत जिले की राजनीति में बड़ा परिवर्तन कर देगी।

दिखावा और अंदरूनी कहानी अलग:

चुनाव में चर्चित सीटों पर सभी का अपना गणित है। सबसे चर्चित सीट को लेकर विशेषज्ञ कहते हैं कि भले ही दिखाया कुछ और जा रहा है, बड़े नेता अभी से जीत का सेहरा बांधकर घूम रहे हैं, लेकिन उन्हीं की पार्टी के नेताओं ने अंदरूनी गड्ढे किए हैं। परिणाम चौंकाने वाले होंगे। जिस बाबा को गया-गया कह रहे हैं, उनके क्षेत्र में हजारों नए मतदाता जुड़े हैं। यहां परिणाम चौंकाने वाले होंगे। ग्रामीण इलाके में जो पार्टी चुनाव के पहले तक मजबूत थी, वह निर्दलीय के फेर में उलझ गई हैै। विधायक को लेकर असंतोष था, लेकिन लगता है कि अंदरूनी लड़ाई उन्हें फायदा पहुंचा देगी।

 लोकतंत्र के लिए सही नहीं ऐसे हथकंडे:

गंज के परंपरागत ठिए पर जमा लोगों का कहना था कि इस बार चुनाव में ऐसे हथकंडे आजमाए गए, जो लोकतंत्र के लिए सही नहीं है। इस बार आखिरी दो दिन में जमकर नकदी का वितरण हुआ। भंडारे, भोजन व्यवस्था तो 24 घंटे चली। पायजेब, साड़ी, कंबल के साथ शराब बांंटने में भी उम्मीदवार पीछे नहीं थे। चुनाव की प्रशासनिक व्यवस्था भी झुकी हुई दिख रही थी, किसी तरह का डर नजर नहीं आया।

कोरी ऊंगली का रहस्य:

इस चुनाव में अपने पक्ष में मतदान के लिए एक ओर खूब जतन किए जा रहे थे, वहीं दूसरी ओर शहर में कोरी ऊंगली दिखाने का भी प्रयास खूब हुआ। आखिर क्या वजह थी कि मतदान के बाद बाएं हाथ की उंगली में लगाई जाने वाली स्याही ना लगाकर लाभ हासिल करने का झांसा कौन और क्यों दे गया। जिन इलाकों में स्याही से परहेज का प्रचार हुआ उनका रहस्य बूथों पर पड़े वोट से उजागर भी हो रहा है।

लोग कह रहे हैं कि जीत और हार के लिए लोकतंत्र के उत्सव में अपने अधिकार का प्रयोग करने से रोकने का यह प्रयास क्या लोकतंत्र को मजबूत करेगा या सिर्फ जीतने वाले का ..???

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