संस्कृति का प्रवाह और जीवन रेखा है ताप्ती: प्रकाश भारती:

छोटी नदियों से है, बड़ी नदियों का अस्तित्व : नदी मित्र ओम प्रकाश भारती ग्लोबल पब्लिक स्कूल में नदी संवाद कार्यक्रम का आयोजन|

बैतूल। नदी मित्र इकाई बैतूल द्वारा आदिम क्लचरल वेलफेयर सोसाइटी के सहयोग से स्थानीय ग्लोबल पब्लिक स्कूल में नदी संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। संवाद कार्यक्रम में मध्य प्रदेश की नदियों के संरक्षण तथा पर गहन चर्चा हुई। मुख्य वक्ता नदी मित्र प्रो. ओम प्रकाश भारती ने कहा कि मध्य प्रदेश नदियों का मायका कहा जाता है, यहां चार सौ से अधिक छोटी बड़ी नदियां हैं, जिनमें सौ से अधिक सुख चुकी है और दो सौ नदियां अतिक्रमण और प्रदूषण को झेल रही है। ताप्ती, नर्मदा के बाद मध्यप्रदेश की दूसरी बड़ी नदी तथा बैतूल जिले की इस जीवनरेखा है। कई शहरों से गुजरने के कारण सीवेज और औद्योगिक कचरे का पानी ताप्ती में मिल रहा है।

आज यह नदी गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है, जिसमें जल स्तर में कमी, प्रदूषण और जैव विविधता का ह्रास प्रमुख हैं। मध्यप्रदेश की गंगा कहे जाने वाली ताप्ती गंभीर प्रदूषण का सामना कर रही है। बरसात के दिनों को छोड़कर यह नदी कई स्थलों पर सूख जाती है। ताप्ती पारसडोह और चन्नीमन्नी बांधों के कारण निचले इलाकों में नदी का बहाव रुक जाता है, जिससे नदी सूख रही है या पानी बहुत कम हो जाता है। बैतूल जिले की तवा, सांपना , देनवा आदि नदियां अतिक्रमण और प्रदूषण को झेल रही है। धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व की नदी क्षिप्रा का जल मानव उपयोगी नहीं रह गया है।

शिप्रा की सहायक नदियां सूख रही हैं, जिससे इसका का प्रवाह सिकुड़ रहा है। नर्मदा की कई सहायक नदियां सूख चुकी है तथा इसका प्रवाह मार्ग सिकुड़ रहा है।अजनार, गाढ़ गंगा, काली सिंध, नेवज, पार्वती,धसान, केन, सिंध, कूनो, स्वर्ण, तमस आदि नदियां पूरी तरह सूख चुकी हैं।

ये नदियाँ कृषि, पेयजल और उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज, अवैध रेत खनन, अत्यधिक जल दोहन और वनों की कटाई जैसे कारणों से संकटग्रस्त हैं।

– नदियों के संरक्षण के लिए दिए सुझाव

प्रो. भारती ने बताया कि खेतों में डाले जाने वाले रसायन बारिश के साथ नदियों में मिलकर जल को जहरीला बना रहे हैं। अनियमित मानसून और कम वर्षा के कारण नदियां गर्मियों में सूख रही हैं। बांधों ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित किया है, जिससे जैव विविधता, विशेषकर मछलियाँ और जलीय जीव, खतरे में हैं। नदियों के संरक्षण के लिए प्रो. भारती ने प्रभावी उपाय सुझाए, जिनमें औद्योगिक और घरेलू अपशिष्ट के लिए उन्नत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना, अवैध रेत खनन पर सख्त कानूनी कार्रवाई, वर्षा जल संचयन, वनीकरण और टिकाऊ जल प्रबंधन नीतियों को बढ़ावा देना शामिल है। उन्होंने स्थानीय समुदायों को नदी संरक्षण में शामिल करने और पर्यावरण शिक्षा के प्रसार पर जोर दिया।

नदी मित्र ने मध्य प्रदेश की नदियों के सांस्कृतिक महत्व को संरक्षित करने के लिए एक विशेष संकल्प लिया। इसके तहत नदियों से जुड़े मिथक, कहानियाँ, गीत, ऐतिहासिक विवरण और मौखिक परंपराओं का संकलन किया जाएगा। नदियों के किनारे बसे समुदायों, तीर्थस्थलों, सांस्कृतिक स्थलों, पर्वों और अनुष्ठानों का अध्ययन होगा। भौगोलिक सूचना प्रणाली के माध्यम से नदियों का डेटाबेस, डिजिटल आर्काइव और संग्रहालय स्थापित करने की योजना है।

—नदियों की ज़मीन हड़पने वालों के विरुद्ध कठोर कानून बने—

नदी मित्र भारती ने कहा छोटी नदियां अतिक्रमण के कारण लुप्त हो रही हैं। छोटी नदियों के प्रवाह क्षेत्र की अधिकांश ज़मीन किसान और रैयतों की है। उच्च मार्ग (हाइवे), रेलवे, उद्योग के लिए ज़मीन अधिग्रहण करने की नीति, योजना तथा अभ्यास है आपके पास, तो इन छोटी नदियों के लिए क्यों नहीं? छोटी नदियां बड़ी नदियों का आधार है। वे भी संस्कृति के प्रवाह हैं, जीवनदायिनी है। छोटे लोगों की उपेक्षा तो करते रहिए, मानव है संघर्ष उनकी नियति है। नदियां तो निर्जीव है, चल फिर तो सकती है, लेकिन कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकती, कोर्ट कचहरी नहीं जा सकती। उसके लिए लड़ना तो समाज को ही होगा। भारत में नदियों से संबंधित कानून मुख्य रूप से जल विवाद निपटान, प्रदूषण नियंत्रण, और संरक्षण पर केंद्रित हैं। अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 और नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 प्रमुख हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता सीमित रही है। नदियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक एकीकृत “नदी अधिनियम” की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

नदी मित्र ने सरकार, स्थानीय समुदायों और पर्यावरण संगठनों से मध्य प्रदेश की नदियों के संरक्षण के लिए समन्वित प्रयास करने का आह्वान किया। नर्मदा, क्षिप्रा, बेतवा, चंबल, और कान्ह जैसी नदियों के संरक्षण के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। यदि समय रहते कार्य नहीं किया गया तो ये नदियां केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी। इसके लिए सरकार के साथ समाज को भी आगे आना होगा। कार्यक्रम का संयोजन स्थानीय रंगकर्मी अक्षत वरवडे ने तथा संयोजन आदिम क्लचरल वेलफेयर सोसाइटी, बैतूल ने किया। इस अवसर पर राहुल यादव, शशिपाल, सचिन खातरकर, साहिल खान, जय खातरकर, सत्येंद्रचौहान, कपिल खातरकर, केतांक, स्मिता वरवड़े, एकता वरवड़े, मोहेंद्र हुरमाड़े, कलीम ज़फ़र आदि उपस्थित थे।

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