Government warned of agitation: गरीबों की पहुंच से दूर हो सकती है चिकित्सा सुविधाएं, निजीकरण से बचाने की मांग, मुख्यमंत्री के नाम सौंपा ज्ञापन
जिला अस्पताल के निजीकरण पर भड़का आदिवासी समाज, सरकार को दी आंदोलन की चेतावनी

बैतूल। समस्त आदिवासी समाज संगठन ने बैतूल के प्रभारी मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में जिला अस्पताल और प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज को पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल पर संचालित करने के आदेश को रद्द करने की मांग की गई है। संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर जिला अस्पताल को निजीकरण के तहत दिया गया, तो गरीब और आम जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
जिला मुख्यालय स्थित जिला अस्पताल को पीपीपी मॉडल के तहत प्राइवेट किए जाने की योजना पर तीखी आपत्ति जताई गई है। सरकार द्वारा 25 नवंबर 2024 को इस योजना के तहत टेंडर बुलाए गए हैं। संगठन ने इस कदम को आम जनता, विशेष रूप से गरीब तबके के लिए हानिकारक बताते हुए इसे शासकीय स्तर पर ही संचालित करने की अपील की है।
आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष सुंदरलाल उइके ने कहा कि यह फैसला गरीब जनता के स्वास्थ्य अधिकारों को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। इस मौके पर संगठन के सदस्य योगेश धुर्वे, भूपेंद्र पन्द्राम, दुर्गा सिंह मर्सकोले, बी.एल. मासोदकर, जितेंद्र सिंह इवने और शंकर सरियाम समेत कई अन्य लोग उपस्थित थे।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि पहले भी कलेक्टर बैतूल के माध्यम से शासन को ज्ञापन भेजा गया था, लेकिन अब तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। संगठन ने कहा कि बैतूल जिले में संचालित शासकीय चिकित्सालय को निजी हाथों में न सौंपा जाए।
संगठन ने आगे कहा कि जिले में पहले से ही कई निजी अस्पताल संचालित हैं, जिनकी उच्च शुल्क प्रणाली गरीबों और जरूरतमंदों के लिए बाधा बनती है। ऐसे में यदि जिला अस्पताल को भी निजीकरण के तहत दिया जाता है, तो आम जनता के लिए चिकित्सा सेवाएं और भी अधिक महंगी हो जाएंगी।
आदिवासी समाज की चेतावनी
आदिवासी समाज ने चेतावनी दी है कि यदि जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज को पीपीपी मॉडल पर देने का फैसला वापस नहीं लिया गया, तो वे व्यापक स्तर पर आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे। इस विरोध के दौरान, गरीब जनता के स्वास्थ्य अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा।
आदिवासी समाज संगठन ने इस मुद्दे को लेकर सरकार से अपील की है कि जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज को शासकीय स्तर पर संचालित किया जाए। अगर सरकार इस दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाती है, तो आंदोलन का रूप और भी बड़ा और व्यापक हो सकता है।




