जयस ने पांचवीं अनुसूची के क्रियान्वयन और वन भूमि विवादों के खिलाफ सौंपा ज्ञापन।

राष्ट्रपति से कहा- संविधान के बावजूद नहीं मिला आदिवासियों को संरक्षण।

बैतूल। ब्रह्माकुमारी आश्रम के कार्यक्रम में शामिल होने बैतूल पहुंचीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को जयस संगठन, समस्त आदिवासी संगठनों और कोरकू संगठन के प्रतिनिधियों ने आदिवासी समाज से जुड़े संवैधानिक, भूमि और वन अधिकारों के मुद्दों पर विस्तृत ज्ञापन सौंपा। कलेक्टर बैतूल के माध्यम से दिए गए ज्ञापन में संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रभावी क्रियान्वयन, स्वतंत्र भारत में आदिवासी समाज पर हुए कथित ऐतिहासिक अन्यायों की समीक्षा तथा वन एवं राजस्व भूमि से जुड़े विवादों के स्थायी समाधान की मांग की गई।

महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम दिए गए ज्ञापन में कहा गया कि 26 जनवरी 1950 से 26 जनवरी 2026 तक के 76 वर्षीय संवैधानिक कालखंड में मध्यप्रदेश के राज्यपालों द्वारा संविधान की पांचवीं अनुसूची की धारा-5 के अंतर्गत अनुसूचित जनजाति वर्ग की भूमि छीने जाने अथवा भूमि आवंटन से जुड़े मामलों में एक बार भी प्रभावी हस्तक्षेप कर आदिवासी समाज को संरक्षण प्रदान नहीं किया गया। ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि राष्ट्रपति भवन द्वारा पूर्व राज्यपाल पी.सी. अलेक्जेंडर की अध्यक्षता में गठित सात राज्यपालों की समिति ने मध्यप्रदेश में आदिवासी प्रतिनिधियों से चर्चा की थी, लेकिन भूमि अधिकारों के संरक्षण के लिए कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया।

– वन, भूमि और न्यायिक व्यवस्था पर लगाए आरोप

ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि स्वतंत्र भारत में वन संरक्षण, जैव विविधता, पर्यावरण संरक्षण और विकास परियोजनाओं के नाम पर अनुसूचित जनजातियों को उनके पारंपरिक निवास क्षेत्रों से बेदखल किए जाने की प्रक्रिया को प्रशासनिक और न्यायिक संरक्षण मिला। सर्वोच्च न्यायालय के टी.एन. गोदाबर्मन प्रकरण की सिविल याचिका क्रमांक 202/95 में 12 दिसंबर 1996 के आदेश का उल्लेख करते हुए कहा गया कि जंगल मद में दर्ज भूमि को वन संरक्षण अधिनियम 1980 के दायरे की वन भूमि मानने से आदिवासी समाज पर हुए कथित ऐतिहासिक अन्याय दोहराए गए।

– बैतूल जिले की भूमि का दिया विस्तृत ब्यौरा

ज्ञापन में बताया गया कि मध्यप्रदेश शासन ने बैतूल जिले के 1167 मालगुजारी ग्रामों तथा 103 रैय्यतवारी ग्रामों की सार्वजनिक एवं निस्तारी प्रयोजन की भूमि को राजस्व अभिलेखों में दखल रहित भूमि के रूप में दर्ज किया था। इसके बावजूद 12 जून 1956 को 683 राजस्व ग्रामों की तीन लाख 60 हजार 478 एकड़ भूमि वन विभाग को अंतरित कर दी गई। ज्ञापन के अनुसार इनमें गोठान, खलिहान, कब्रिस्तान, श्मशान, चरनोई, चारागाह, बाजार, जलाऊ लकड़ी, गौण खनिज, लघु वनोपज तथा अन्य सामुदायिक उपयोग की भूमि शामिल थी, जिन्हें बाद में वन विभाग ने संरक्षित वन मानकर कार्रवाई शुरू कर दी।

– वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन पर भी जताई आपत्ति

ज्ञापन में कहा गया कि संसद द्वारा पारित अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 ने औपनिवेशिक काल और स्वतंत्र भारत में आदिवासी समुदाय के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार किया था, लेकिन मध्यप्रदेश में इस कानून का उद्देश्यपूर्ण क्रियान्वयन नहीं हुआ। उलटे इसके माध्यम से समुदाय के खिलाफ नए अन्यायों की नींव रखे जाने का आरोप लगाया गया।

– राष्ट्रपति से संवैधानिक हस्तक्षेप की मांग

जयस संगठन, समस्त आदिवासी संगठनों और कोरकू संगठन के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से पांचवीं अनुसूची की धारा-5 के तहत प्राप्त विशेष संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए 1950 से 2026 तक आदिवासी समाज से जुड़े भूमि, वन और निस्तार अधिकारों पर हुई समस्त कार्यवाहियों की उच्चस्तरीय समीक्षा कराने, स्वतंत्र भारत में हुए कथित ऐतिहासिक अन्यायों को समाप्त करने तथा आदिवासी समुदाय को उनके पारंपरिक अधिकार बहाल करने के लिए ठोस पहल करने की मांग की। ज्ञापन के साथ वन विभाग और राजस्व विभाग की कार्यवाहियों, सर्वोच्च न्यायालय को प्रेषित मांगपत्र तथा संबंधित दस्तावेजों का विस्तृत ब्यौरा भी संलग्न किए जाने की जानकारी दी गई।

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