सीता जी का पावन पतिव्रता धर्म युगों युगों तक स्त्री जाति का गौरव बढाता रहेगा।

पं निर्मल कुमार शुक्ल।।

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श्री हनुमत कथा महोत्सव सप्तम दिवस

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अशोक वृक्ष से माता सीता का दर्शन करते हुए हनुमान जी को आर्य नारी जाति पर जितना गौरव हुआ वह वर्णन से परे है।एक तरफ अकेली भूखी प्यासी अपने स्वजनों से बहुत दूर परदेश में एक आक्रांता के कैद में पड़ी हुई सीता जी हैं तो दूसरी ओर ब्रह्माण्ड विजेता रावण।यम काल वरुण इंद्र आदि देवता जिससे भयभीत रहते हैं तीनों लोकों में उस समय रावण का मुकाबला करने वाले देव दानव यक्ष गंधर्व कोई नहीं थे। ब्रह्मा जी प्रतिदिन रावण के यहां आपर वेद पाठ करते थे और शंकर जी रावण के पूजा का समय जानकर दौड़ते हुए पूजा ग्रहण करने आते थे। क्षीरसागर में जाकर रावण ने भगवान विष्णु से भी युद्ध किया विष्णु ने चक्र चला दिया जिसका प्रहार रावण ने दाहिने भुजा पर सहन कर लिया।ऐसा भुवन विजेता रावण सीता का क्रीतदास बनने को तैयार है अनुनय विनय कर रहा है आग्रह कर रहा है कि सीता एक बार उसकी ओर देख दें बस मंदोदरी आदि 14,000 रानियों को उनकी दासी बना देगा। स्वर्ण की लंका तथा संसार का समस्त ऐश्वर्य सीता के चरणों में अर्पण कर दूंगा।धन्य हैं भारत की वो महादेवी जिन्होंने चरण की ठोकर से भी इस ऐश्वर्य की छूना पसंद नहीं किया तथा रावण का गर्व धूल में मिला दिया। सीता ने जिन शब्दों में रावण की भर्त्सना किया।सुनु दशमुख खद्योत प्रकाशा।कबहुं कि नलिनी करि विकासा।अरे अधम नीच रावण मैं वह कमलिनी हूं जो श्रीराम जैसे सूर्य के प्रकाश में प्रफुल्ल होती है तेरे जैसे जुगुनू के टिमटिमाने से नहीं। गंगा जी तो मात्र पृथ्वी लोक को पवित्र करती हैं किन्तु सीता वह गंगा हैं जिनके द्वारा करोड़ों ब्रह्माण्ड पवित्र होते हैं।न्यू बैतूल स्कूल ग्राउंड में श्री हनुमत कथा महोत्सव के सप्तम दिवस मानस महारथी पं निर्मल कुमार शुक्ल ने विशाल श्रोता समूह के समक्ष उक्त उद्गार व्यक्त किए। अशोक वाटिका में श्री हनुमान और सीता संवाद की चर्चा करते हुए आपने कहा हनुमान जी अशोक वृक्ष के सघन पत्तों में छिपकर सारा दृश्य देख रहे थे। रावण क्रुद्ध होकर सीता को एक महीने की अवधि देकर चला गया तब सीता जी त्रिजटा से आग मांगने लगीं क्योंकि अगर प्रभु के वियोग में प्राण नहीं त्यागा तो मेरा प्रेम अधूरा रह जाएगा।प्रेम की अंतिम अवस्था मृत्यु होती है अगर मछली जल के वियोग में प्राण त्याग न करे तो उसका प्रेम अधूरा रह जाएगा। त्रिजटा सीता को समझा बुझाकर चली गई अंत में सीता जी आकाश चंद्रमा और अशोक वृक्ष से अग्नि की याचना करने लगीं किंतु किसी ने आग नहीं दिया अंत में हनुमान जी ने भगवान श्री राम की मुद्रिका देकर सीता जी को भगवान श्री राम की कथा सुनाते हुए उनके विरह अग्नि को शीतल किया। भगवान श्रीराम का संदेश सुनाते हुए अपना परिचय देकर सीता को धैर्य दिलाया। हनुमान जी कहते हैं माता श्रीराम आपके वियोग में दिन रात दुखी रहते हैं बहुत शीघ्र उनका आगमन लंका में होगा। महासागर को चाहे बांधना पड़े लांघना पड़े या सोखना पड़े किंतु भगवान शीघ्र आएंगे। वैसे तो सारे राक्षसों को मारकर मैं अभी आपको ले जा सकता हूं किन्तु प्रभु का आदेश नहीं हैं। इस प्रकार सीता को धैर्य दिलाते हुए अशोक वाटिका उजाड़ कर रावण के 80,000 सैनिकों को मार कर लंका जलाकर भगवान श्री राम के अपूर्व प्रभाव का दर्शन कराया हनुमान जी ने माता सीता जो विरह सागर में डूबे रही थीं उन्हें आश्वासन देकर माता की चूड़ामणि लेकिन निर्विघ्न वापस आ गए। कार्य क्रम के आयोजक राजेश अवस्थी संगीता अवस्थी एड. प्रमोद अवस्थी प्रिया अवस्थी मृणालिनी अवस्थी और शोभित अवस्थी ने पुष्पहार डाल कर महराज श्री का स्वागत किया तथा सभी धर्म प्रेमी सज्जनों देवियों से अधिकाधिक संख्या में पधारकर 27 मार्च रामनवमी पर्यंत दोपहर 3 से 6 बजे तक कथामृत पान करने का आग्रह किया है।

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