अब बिना ठोस जांच आदेश संभव नहीं: अधिवक्ता भारत सेन।

अवैध खनन केस में बिना जांच कार्रवाई को कोर्ट ने बताया यांत्रिक। दोषी अधिकारियों से वसूले जाएंगे 50 हजार, याचिकाकर्ता को राहत।

बैतूल। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर खंडपीठ ने अवैध खनन परिवहन से जुड़े एक मामले में पारित आदेश को निरस्त करते हुए राज्य सरकार पर 50 हजार रुपए का हर्जाना लगाने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने यह भी कहा है कि उक्त राशि संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल कर याचिकाकर्ता को दी जाए।

बैतूल जिला न्यायालय के अधिवक्ता भारत सेन ने इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए बड़ा संदेश है कि बिना ठोस साक्ष्य, गहन जांच और स्वतंत्र अनुप्रयोग के कोई भी दंडात्मक आदेश टिक नहीं पाएगा। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत जवाबदेही तय होने से भविष्य में निर्दोष लोगों को फंसाने वाली लापरवाही पर प्रभावी रोक लगेगी और यह आम नागरिकों के लिए न्याय की महत्वपूर्ण जीत है।

उन्होंने बताया कि अदालत ने कलेक्टर का 27 जनवरी 2025 का आदेश निरस्त करते हुए हर्जाने की राशि दोषी अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से वसूलने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला प्रदेश में अवैध खनन जैसे संवेदनशील मामलों में प्रशासन को अधिक सतर्क बनाएगा और पारदर्शिता व न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास को मजबूत करेगा।

अधिवक्ता भारत सेन के अनुसार सारंग रघुवंशी बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य

रिट याचिका क्रमांक डब्ल्यूपी-11018-2025 में 13 मार्च 2026 को जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने यह निर्णय दिया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शोएब हसन खान ने पैरवी की।

मामला छिंदवाड़ा जिले के चौरई क्षेत्र से जुड़ा है, जहां माइनिंग विभाग द्वारा अवैध खनिज परिवहन के संदेह में ट्रक क्रमांक आरजे 14 जीई 8519 को जब्त किया गया था। विभागीय कार्रवाई के दौरान ट्रक चालक के कथन के आधार पर याचिकाकर्ता को संबंधित मानते हुए आगे की प्रक्रिया की गई, जबकि अभिलेखों के अनुसार वाहन का पंजीकृत स्वामित्व अन्य व्यक्ति के नाम दर्ज बताया गया।

याचिका में यह कहा गया कि बिना स्वतंत्र जांच, बिना स्वामित्व की पुष्टि और बिना समुचित अवसर दिए 27 जनवरी 2025 को एमपी मिनरल्स (इलीगल एक्सकेवेशन, ट्रांसपोर्टेशन एंड स्टोरेज) रूल्स, 2022 के नियम 23 के तहत आदेश पारित किया गया। इस पर न्यायालय ने उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर प्रक्रिया के पालन को आवश्यक बताया और आदेश को निरस्त कर दिया।

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि प्रशासनिक निर्णय लेते समय तथ्यों की समुचित जांच और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अपेक्षित है। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि जिम्मेदारी तय होने की स्थिति में संबंधित अधिकारियों से हर्जाना वसूल किया जाए। अधिवक्ता भारत सेन ने कहा कि यह निर्णय प्रशासनिक प्रक्रिया के पालन के महत्व को रेखांकित करता है और भविष्य में मामलों की जांच में सावधानी बरतने का संकेत देता है।

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